ठाकुर, बात कुछ बन नहीं रही है, कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि क्या होगा और होगा तो भी कैसे।
“नियति नियम अस्ति, संयम सर्वोपरि।”
कद में छोटा, काम ऐसा कि पहली नज़र में ही लग जाए, ये हुनर कहाँ से आया? Baby play के दौरान, मेरे पड़ोसी के रूप में मुझे इनसे मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन दिनों महाशय crowd, यानी जूनियर आर्टिस्ट की भूमिका में लगभग हर सेट पर मिल जाते थे। आर्थिक स्थिति डांवाडोल और घर का बोझ ये सब आदमी की कला को ढंग से मरोड़ता है। लेकिन चेहरे पर एक उत्सुकता, सीखने की लालसा, पा लेने की चाह, और कुछ अनमोल कविताओं का संग्रह साथ में इरफान साहब की बातें कभी नहीं छूटीं।
मढ़ के उबड़-खाबड़ रोड पर मनीषा बंगले में एक प्रोजेक्ट बन रहा था। इन भाईसाहब का ऑडिशन हुआ, लेकिन इन्हें हताशा हाथ लगी। सड़क पर चलते वक्त तमाम टीका-टिप्पणियाँ इनके नाम पर जमा दी गईं कि इस सड़क पर ये जूनियर को लीड करते हैं, किसी भी भीड़ में सबसे छोटे होने के बावजूद जूनियर में सबसे आगे इन्हें रखा जाता है, और उसी हिसाब से इनकी आर्थिक मूल्य भी तय कर दी गई। लेकिन मजाल है कि ये निराश हों।
उस दिन साथ होने के नाते मुझे उदासी थी। क्योंकि एक शाम मेरे कमरे का दरवाज़ा किसी ने उत्सुकतावश खटखटाया और बेफिक्री से अपना ऑडिशन दिखाया। हालांकि उनके लिए वो बड़ा झटका नहीं था, क्योंकि समुद्र की गहराई खुद समुद्र को पता नहीं होती। हाँ, मेरे लिए वो एक आश्चर्य से भरा वाकया था। उस ऑडिशन को देखकर मैं अचंभित था कि ये लड़का अभी तक इतनी सामान्य भूमिकाएँ क्यों निभा रहा है।

कुछ बात हुई और नतीजा ये निकला कि हम साथ में थिएटर करेंगे। और उसी दिन से इन्होंने मुझे एक नाम दे दिया “गुरु”, जिसका मैं हकदार नहीं हूँ। क्योंकि मेहनत सारी इनकी है, भूख इनकी है। लेकिन ये इनका बड़प्पन था।
खैर, सिलसिला आगे बढ़ा। गिद्ध प्ले के दौरान छोटे बेटे का किरदार करते वक्त, जब इनके प्रवेश मात्र से वहाँ बैठी जनता हँसी-ठिठोली करने पर मजबूर हो जाती थी, तो कई बार मेरा मन मढ़ की सड़क और साथी कलाकारों द्वारा इन पर की गई टिप्पणियों को याद करता और मुझे आश्चर्य में डाल देता क्या ये वही लड़का है जो मेरे पड़ोस में था?
गिद्ध का मंचन हुआ। छोटे बेटे उमाकांत के चरित्र में मैंने इन्हें पहली बार रंगमंच पर देखा और जीवित उमाकांत के दर्शन हुए। दर्शकों की तालियाँ थीं, और मैं अब भी कुछ डबडबाई और गीली आँखों से देख रहा था।
कविताओं की संध्या और मोबाइल फोन पर लिखी कुछ कविताएँ उत्सुकतावश मैं भी पढ़ना चाहता था। एक मौके की दरकार थी। किसी तरह मंच पर पहुँचे और महाशय ने राधा और श्रीकृष्ण पर एक कविता पढ़ डाली। इस तरह इनका कवि रूप विराजमान हुआ कि ये एक अच्छे कवि भी हैं। लेखनी की ताकत विस्तृत है और हुनर सराहनीय है।
एक पिता, जिसे अपने बच्चे का एडमिशन इंग्लिश मीडियम स्कूल में करवाना है, और उसके लिए उसका संघर्ष जगह-जगह की धूल फाँकता हुआ जब आखिरी बार भगवान से शिकायत करता है, तो दर्शक दीर्घा में बैठा इनका बड़ा भाई इनसे सीखता है कि अभिनय के दौरान रोया कैसे जाता है।
इनका दिल साफ है या नहीं, ये तो नहीं पता, लेकिन दिल है इनके पास। क्योंकि हास्य-व्यंग्य इनके जीवन का हिस्सा है। हाल ही में इनकी एक वेबसीरीज़ आई, जिसका नाम है Matka King। बड़े-बड़े सितारों से सजी इस सीरीज़ में जब इन्हें देखा, तो अंदर एक जलन हुई कि इतना बेहतरीन अभिनेता कैसे बना जा सकता है। शायद भगवान ने ही इन्हें भेजा है। अभी तो शुरुआत हुई है, कहानी अभी बाकी है।




Leave a Comment